इटावा 15 जून / रेगिस्तान के जहाज कहें जाने वाले ऊंट की संख्या भले ही जिला इटावा में कम देखी जा रही हो लेकिन ऊंट पट्टी का क्षेत्र कहें जाने वाले चकरनगर में इन्हें पालने वाले शौंकोनी को संख्या कम नहीं है और वह उनसे काम ही नहीं लेते इनकी सवारी भी करते है। गौरतलब है कि यमुना, चम्बल, क्वारी, सिंध व पहूज नदियों के बीच बसे चकरनगर क्षेत्र में वर्तमान में रेगिस्तान का जहाज कहें जाने वाले ऊंटों की संख्यां 115 ही रह गई है। यह संख्या कितनी तेजी से घटी है इसका पता इससे ही लगता है कि 10 वर्ष पूर्व 2001 में ऊंटों की संख्या। जहां 21 हजार के आस-पास थी। बात अगर इससे भी दस वर्ष पूर्व की करें तो वह संख्या 23 हजार से ऊपर थी। 2001 के बाद से जिस तरह से ऊंटों की संख्यां घटी है वह अपने आप में चौकाने वाली है। चकरनगर क्षेत्र में पूर्व में ऊंटों को पालने का प्रचलन इस लिए भी ज्यादा था कि क्षेत्र में याता-यात का कोई साधन नहीं था तब ग्रामीण ऊंट की पीठ पर पलान लगाकर बजन ढुलाई का काम करते थे जिससे ऊंट पालको को अच्छा धनार्ज पार्जन होता था और तब एक-एक ऊंट पालक के पास करीब तीन-तीन दर्जन ऊंट हुआ करते थे लेकिन बदलते दौर के चलते इस व्यवसाय व पालन में बेतहासा आई गिरावट के भी कई कारण सामने आये है। इस बारे में ऊंट पालक एवं तेजपुरा निवासी गजाधर सिह चौहान ने बताया कि इनका पैर गद्दी दार होता है जिसमें कांटा चुभने का खतरा हमेशा बना ही रहता है। ऐसे में जोली फ्लोरा की अधिकता ने ऊंट पालकों को चिन्तित कर दिया है। कहा कि जोली फ्लोरा जिसे बिलायती बबूल कहते है का कांटा जिस जगज लग जाता है वहां पर जरा सी भी असाबधानी तथा चलने पर उस स्थान पर गलाव की स्थिति पैदा हो जाती है यही बजह है कि ऊंट पालने या इनसे व्यवसाय करने से लोग अब किनारा करने लगे है। एक अन्य ऊंट पालक राजेन्द्र प्रसाद तिवारी का कहना है कि उन्हें ऊंट पालने का शौक बचपन से ही है और आज भी काफी मौज-मंस्ती आती है। बताया कि जब वह ऊंट पर पलान रखकर इसकी सवारी करते थे और व्यवसाय भी करते थे तब इस क्षेत्र में ऊंटों की बहुतायत होने का एक कारण यह भी था कि ऊंटों को अपना पसंदीदा चारा बड़ी आसानी से मिल जाता था। आमतौर पर कठबेरी, झरबेरी के पौधे बहुतायत पाये जाते थे। ऊंटों का एक चारा जबासा भी है जो नदियों के किनारे तराई वाले इलाके में पाया जाता है। इसकी शाखाओं की खास विशेषता ये होती है जैसे-जैसे लपट तेज होती है जबासा उतना ही हरा-भरा दिखाई पड़ता है। वर्षा होने पर इसी जबासा की शाखायें उसी तरह सूख जाती है जैसे पाला पड़ने पर आलू आदि सूख जाता है। 75 वर्षीय एवं टेहनपुर (मध्य प्रदेश) निवासी वीरेन्द्र सिह राजावत का कहना है कि ऊंट पालने का शौंक उन्हें भी बचपन से ही और वह एक साथ कई ऊंटों को पाल कर अपना शौंक पूरा कर चुके है। उनका कहना है कि इस मंहगाई के दौर में ऊंट रख पाना किसी चुनौती से कम और मुश्किल भरा है। उन्होंने अन्य समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि जोली फ्लोरा (बिलायती बबूल) की बहुताय ने इस शौक पर अपना बुरा असर इस तरह डाला कि ऊंट बीमार पड़ जाते है तो उनका कोई इलाज भी सम्भव नहीं होता। डाक्टर भी इलाज के मामले में हाथ खड़े कर लेते है। बीमार ऊंट का इलाज मुख्यत: उसे दागना होता है और अब दगेरों की भी कमी हो गई तो वहीं नई पीड़ी इस विशालकाय भारी भरकम शरीर वाले ऊंट को पालने के लिए तैयार नहीं है। शायद यहीं वजह है कि हजारों ऊंटों वाली इस भूमि पर अब ऊंटों की संख्या सैंकड़ों से भी कम रह गई है। इस बारे में चकरनगर क्षेत्र के प्रताप पुरा, बल्लों की गढिया एव कुंदोल गांव में रहने वाले ऊंट पालने के शौकीनों ने बताया कि अब ऊंट पालना उनके लिए घाटे का सौदा हो रहा है और ऐसी स्थिति में कोई भी उनके ऊपर रूपये लगाना नहीं चाहता है। इन सभी का कहना ये भी है कि बिडम्बना तो इस बात की है कि ऊंट का कोई अंग्रेजी इलाज नहीं है ऐसी स्थिति में जब ऊंट बीमार पड जाते है तो उन्हें क्षेत्र के प्रसिद्ध चिकित्सक जो वर्तमान में काफी बुर्जग हो चले है साथ ही जिला मुख्यालय इटावा पर रहने से उन्हें गांव तक लाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पडता है। बढ़ती उम्र के चलते उनसे भी अब कोई उम्मीद नहीं की जा सकती |
Wednesday, June 15, 2011
Monday, June 6, 2011
जितना मजबूत संगठन उतनी मजबूत पुलिस : सुवोध
पुलिस एसोसिएशन एक सामाजिक पुलिस कल्याणकारी संगठन है और जिसको मजबूत करने के लिए हर पुलिस कर्मी की जिम्मेदारी है क्योंकि इसके माध्यम से ही हम पुलिस कर्मी एक दुसरे की मदद कर सकते हैं | यह जानकारी आज इटावा में उत्तर प्रदेश पुलिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुवोध यादव ने देते हुए कहा हम लोग इस संगठन के माध्यम से प्रदेश पुलिस के आल्हा अफसरों को अपनी समस्याओं से अवगत करा सकते हैं |
पुलिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष ने सभी चार लाख अराजपत्रित पुलिस जनों को संगठन की जानकारी देते हुए कहा कि जितना अपना संगठन मजबूत होगा उतना ही हर पुलिस कर्मी मजबूत होगा और हम लोग इसी संगठन के माध्यम से अपने साथियों की व उनके परिजनों की विपत्ति में मदद हो सकेगी | उन्होंने कहा कि हम लोग प्रदेश भर में जा-जा कर अपने संगठन के प्रति लोगों को जागरूक बनाने का काम कर रहे हैं लेकिन हमारी ही कुछ पुलिस की गुप्तचर एजेंसियां शासन को झूंठी , भ्रामक और मनगढ़ंत खबरें कुछ आई पी एस अफसरों के इशारे पर भेज रहे हैं जिससे शासन हम लोगों के प्रति उदासीन है |
उन्होंने बताया अभी हाल में वे प्रदेश के बरेली जिले में भी गए थे जिसकी भी गलत और भ्रामक , रिपोर्ट पुलिस की गुप्तचर एजेंसी ने शासन को भेजी है | उन्होंने बताया अभी एक दिन पूर्व में बरेली गया था | इस दौरान हमने किसी कालेज या किसी संस्थान में कोई मीटिंग नहीं की थी बल्कि हमने कई पूर्व परिचित पुलिस कर्मियों को सिटी स्टेशन बरेली मणिनाथ पर उन साथियों को संगठन की जानकारी दी थी | उन्होंने बताया कि बरेली में जो हुआ वो कोई नई बात नहीं है येसी झूंठी और भ्रामक खबरें प्रदेश के कई जिलों में पहले भी हो चुकीं हैं | उन्होंने अपने चार लाख पुलिस कर्मियों से यह भी कहा है कि संगठन से संबंधित किसी प्रकार की जानकारी के लिए हमारे साथी मेरे मोवाइल ९४५७४४११८८ पर कर सकते हैं |
पुलिस एसोसिएशन के उपाध्यक्ष ने सभी चार लाख अराजपत्रित पुलिस जनों को संगठन की जानकारी देते हुए कहा कि जितना अपना संगठन मजबूत होगा उतना ही हर पुलिस कर्मी मजबूत होगा और हम लोग इसी संगठन के माध्यम से अपने साथियों की व उनके परिजनों की विपत्ति में मदद हो सकेगी | उन्होंने कहा कि हम लोग प्रदेश भर में जा-जा कर अपने संगठन के प्रति लोगों को जागरूक बनाने का काम कर रहे हैं लेकिन हमारी ही कुछ पुलिस की गुप्तचर एजेंसियां शासन को झूंठी , भ्रामक और मनगढ़ंत खबरें कुछ आई पी एस अफसरों के इशारे पर भेज रहे हैं जिससे शासन हम लोगों के प्रति उदासीन है |
उन्होंने बताया अभी हाल में वे प्रदेश के बरेली जिले में भी गए थे जिसकी भी गलत और भ्रामक , रिपोर्ट पुलिस की गुप्तचर एजेंसी ने शासन को भेजी है | उन्होंने बताया अभी एक दिन पूर्व में बरेली गया था | इस दौरान हमने किसी कालेज या किसी संस्थान में कोई मीटिंग नहीं की थी बल्कि हमने कई पूर्व परिचित पुलिस कर्मियों को सिटी स्टेशन बरेली मणिनाथ पर उन साथियों को संगठन की जानकारी दी थी | उन्होंने बताया कि बरेली में जो हुआ वो कोई नई बात नहीं है येसी झूंठी और भ्रामक खबरें प्रदेश के कई जिलों में पहले भी हो चुकीं हैं | उन्होंने अपने चार लाख पुलिस कर्मियों से यह भी कहा है कि संगठन से संबंधित किसी प्रकार की जानकारी के लिए हमारे साथी मेरे मोवाइल ९४५७४४११८८ पर कर सकते हैं |
Saturday, June 4, 2011
90 लावारिस शवों को है अपनी शिनाख्त का इंतजार
इटावा- जनपद में विभिन्न पुलिस थाना क्षेत्रों के अंतर्गत घटित होने वाली दुर्घटनाओं में अनेक ऐसे लोग दुर्घटनाग्रस्त होकर अकाल मृत्यु के शिकार हुए है जिनकी शिनाख्त करने वाला कोई नहीं होता और ऐसे बदनसीब मृतकों के शवों को पुलिस लावारिस मान कर मुर्दाघर पहुंचा देती है और ऐसे लोगों के कपड़े लत्ते व अन्य सामान काफी समय तक थाना पुलिस रखे भी रहती है लेकिन फिर भी कोई इन्हें पहचानने नहीं आता। वर्ष 2010 में जनवरी से लेकर अब तक मई 2011 तक का पुलिस रिकार्ड बताता है कि कुल 220 लोग ट्रेन हादसे के शिकार हुए जिससे 90 लावारिस लाशों की पहचान का संकट आज तक बरकरार है। अज्ञात रूप से मरने वालों में सार्वधिक वह लोग होते है जो ट्रेन में सफर के दौरान हादसे के शिकार होते है इनमें ऐसे भी होते है कुछ लोग आत्महत्या ट्रेन से कटकर कर लेते है तो कुछ सावधानीवश रेलवे ट्रेक पार करते समय मौत का शिकार हो जाते है वहीं कुछ लोग रेलगाड़ी की यात्रा करते समय किसी न किसी कारण गिरकर मर जाते है। यह आश्चर्यजनिक रहस्य आज तक बना हुआ है। कि जनपद में इटावा थाने का रेलवे ट्रेक लगभग एक सौ किलोमीटर के दायरे में रेलवे ट्रेक पर इस तरह की घटनाये लगभग रोजाना हो रही है। वर्ष 2011 जनवरी से लेकर दिसम्बर से मई तक 190 लोगों की मृत्यु हुई जिनमें 60 लोगों की शिनाख्त आज तक नहीं हो सकी इसी तरह वर्ष 2011 में जनवरी से लेकर अप्रैल माह तक 5 लोग ट्रेन की चपेट में आने से मरे जिनमें से कुल 20 लोगों की पहचान का संकट आज भी बरकरार है ये अज्ञात शव अपनी पहचान के लिए मोहताज बने रहे और किसी ने इनकी शिनाख्त नहीं की। क्या यह मान लिया जाए कि इतने लोगों का इस दुनिया में कोई नहीं था। पुलिस की माने तो वह बराबर मृतक की शिनाख्त करने की प्रयास करती है। इस बारे में इटावा के जी आर पी थानाध्यक्ष अनिल कुमार श्रीवास्तव बताते है कि आज्ञात शवों के साथ समाचार पत्रों में भी प्रकाशन कराया जाता है। बावजूद इसके इन अभागे शवों की शिनाख्त नहीं हो पाती। घटना के समय शव के पास से मिले सामान को पहचान के लिए सुरक्षित रखा जाता है ताकि भविष्य में मृतक का कोई सम्बन्धी आकर पहचान कर सके। पुलिस के अनुसार लावारिस लाशों से सार्वधिक पूर्वांचल के लोग पृतीत होते है ये लोग जनरल कोचों में सवार होते है। सामान्य डिब्बों में भी भीड़ अधिक होने पर लोग ट्रेन में लटककर या किनारे डिब्बों के दरवाजे पर बैठ कर यात्रा करते है। जो किसी प्रकार धक्के या नींद आने पर ट्रेन से गिरकर दुर्घटनाग्रस्त हो जाते है। इटावा जीआरपी थानाध्यक्ष बताते है कि दुर्घटना के बाद जब तक पुलिस घटनास्थल पर पहुंचती है तब तक स्थानीय लोग मृतक का मोबाइल पर्स व अन्य सामान लूटकर चले जाते हैं इस कारण इनकी पहचान के लिए संकट खड़ा कर देते है। ऐसे में शव की पहचान के लिए पुलिस का सिरदर्द और बढ़ जाता है। इसके अलावा एक बिडम्बना यह भी है कि रेलवे एवं सिविल पुलिस दोनों ही केवल ट्रेक पर पर पड़ें शवों को उठाने तक ही सीमित है। कई बार सीमा विवाद में शव घंटों दुर्घटना स्थल पर पड़े रहते है। ऐसे में अनेक ट्रेने शव पर गुजरकर उसे क्षतिग्रस्त बना देती है तब तक शव इतने क्षतिग्रस्त हो जाते है कि पुलिस द्वारा इन शवों के लोथड़ों को समेटना एक समस्या बन जाता है।
neeraj mahere
nai duniya
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