Wednesday, June 15, 2011

रेगि‍स्तामनी जहाजों से खाली होता चम्बल क्षेत्र

  
 
 
 
इटावा 15 जून /  रेगि‍स्तान के जहाज कहें जाने वाले ऊंट की संख्या भले ही जि‍ला इटावा में कम देखी जा रही हो लेकि‍न ऊंट पट्टी का क्षेत्र कहें जाने वाले चकरनगर में इन्हें पालने वाले शौंकोनी को संख्या कम नहीं है और वह उनसे काम ही नहीं लेते इनकी सवारी भी करते है। गौरतलब है कि‍ यमुना, चम्बल, क्वारी, सिंध व पहूज नदि‍यों के बीच बसे चकरनगर क्षेत्र में वर्तमान में रेगि‍स्तान का जहाज कहें जाने वाले ऊंटों की संख्यां 115 ही रह गई है। यह संख्या कि‍तनी तेजी से घटी है इसका पता इससे ही लगता है कि‍ 10 वर्ष पूर्व 2001 में ऊंटों की संख्या। जहां 21 हजार के आस-पास थी। बात अगर इससे भी दस वर्ष पूर्व की करें तो वह संख्या 23 हजार से ऊपर थी। 2001 के बाद से जि‍स तरह से ऊंटों की संख्यां घटी है वह अपने आप में चौकाने वाली है। चकरनगर क्षेत्र में पूर्व में ऊंटों को पालने का प्रचलन इस लिए  भी ज्यादा था कि‍ क्षेत्र में याता-यात का कोई साधन नहीं था तब ग्रामीण ऊंट की पीठ पर पलान लगाकर बजन ढुलाई का काम करते थे जि‍ससे ऊंट पालको को अच्छा धनार्ज पार्जन होता था और तब एक-एक ऊंट पालक के पास करीब तीन-तीन दर्जन ऊंट हुआ करते थे लेकि‍न बदलते दौर के चलते इस व्यवसाय व पालन में बेतहासा आई गि‍रावट के भी कई कारण सामने आये है। इस बारे में ऊंट पालक एवं तेजपुरा नि‍वासी गजाधर सि‍ह चौहान ने बताया कि‍ इनका पैर गद्दी दार होता है जि‍समें कांटा चुभने का खतरा हमेशा बना ही रहता है। ऐसे में जोली फ्लोरा की अधि‍कता ने ऊंट पालकों को चि‍न्तित कर दि‍या है। कहा कि‍ जोली फ्लोरा जि‍से बि‍लायती बबूल कहते है का कांटा जि‍स जगज लग जाता है वहां पर जरा सी भी असाबधानी तथा चलने पर उस स्थान पर गलाव की स्थिति‍ पैदा हो जाती है यही बजह है कि‍ ऊंट पालने या इनसे व्यवसाय करने से लोग अब कि‍नारा करने लगे है। एक अन्य ऊंट पालक राजेन्द्र प्रसाद ति‍वारी का कहना है कि‍ उन्हें ऊंट पालने का शौक बचपन से ही है और आज भी काफी मौज-मंस्ती आती है। बताया कि‍ जब वह ऊंट पर पलान रखकर इसकी सवारी करते थे और व्यवसाय भी करते थे तब इस क्षेत्र में ऊंटों की बहुतायत होने का एक कारण यह भी था कि‍ ऊंटों को अपना पसंदीदा चारा बड़ी आसानी से मि‍ल जाता था। आमतौर पर कठबेरी, झरबेरी के पौधे बहुतायत पाये जाते थे। ऊंटों का एक चारा जबासा भी है जो नदि‍यों के कि‍नारे तराई वाले इलाके में पाया जाता है। इसकी शाखाओं की खास वि‍शेषता ये होती है जैसे-जैसे लपट तेज होती है जबासा उतना ही हरा-भरा दि‍खाई पड़ता है। वर्षा होने पर इसी जबासा की शाखायें उसी तरह सूख जाती है जैसे पाला पड़ने पर आलू आदि‍ सूख जाता है। 75 वर्षीय एवं टेहनपुर (मध्य प्रदेश) नि‍वासी वीरेन्द्र सि‍ह राजावत का कहना है कि‍ ऊंट पालने का शौंक उन्हें भी बचपन से ही और वह एक साथ कई ऊंटों को पाल कर अपना शौंक पूरा कर चुके है। उनका  कहना है  कि‍ इस मंहगाई के दौर में ऊंट रख पाना कि‍सी चुनौती से कम और मुश्किल भरा है। उन्‍होंने अन्य समस्‍याओं का जि‍क्र करते हुए कहा कि‍ जोली फ्लोरा (बि‍लायती बबूल) की बहुताय ने इस शौक पर अपना बुरा असर इस तरह डाला कि‍ ऊंट बीमार पड़ जाते है तो उनका कोई इलाज भी सम्भ‍व नहीं होता। डाक्टर भी इलाज के मामले में हाथ खड़े कर लेते है। बीमार ऊंट का इलाज मुख्यत: उसे दागना होता है और अब दगेरों की भी कमी हो गई तो वहीं नई पीड़ी इस वि‍शालकाय भारी भरकम शरीर वाले ऊंट को पालने के लि‍ए तैयार नहीं है। शायद यहीं वजह है कि‍ हजारों ऊंटों वाली इस भूमि‍ पर अब ऊंटों की संख्या सैंकड़ों से भी कम रह गई है। इस बारे में चकरनगर क्षेत्र के प्रताप पुरा, बल्लों की गढि‍या एव कुंदोल गांव में रहने वाले ऊंट पालने के शौकीनों ने बताया कि‍ अब ऊंट पालना उनके लि‍ए घाटे का सौदा हो रहा है और ऐसी स्थिति‍ में कोई भी उनके ऊपर रूपये लगाना नहीं चाहता है। इन सभी का कहना ये भी है कि‍ बि‍डम्ब‍ना तो इस बात की है कि‍ ऊंट का कोई अंग्रेजी इलाज नहीं है ऐसी स्थिति‍ में जब ऊंट बीमार पड जाते है तो उन्हें क्षेत्र के प्रसि‍द्ध चि‍कि‍त्सक जो वर्तमान में काफी बुर्जग हो चले है साथ ही जि‍ला मुख्यालय इटावा पर रहने से उन्हें गांव तक लाने में काफी दि‍क्कतों का सामना करना पडता है। बढ़ती उम्र के चलते उनसे भी अब कोई उम्मीद नहीं की जा सकती  |

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