पुलिस कर्मचारी आजतक अंग्रेजी काल के गुलाम कानून के अंतर्गत गुलामी के लिए अभिशप्त हैं , चूँकि आजाद भारत की जनता भी १८६१ के पुलिस कानून से त्रस्त है इसी लिए पुलिस अधिकारी भी नोकरी बचाने को मजबूर हैं लेकिन यू०पी० पुलिस के जांबाज बहादुर सिपाहियों को निरास होने की जरुरत नहीं है बल्कि धैर्य पूर्वक अपने जायज अधिकारों ,परिवार कल्याण तथा मानवाधिकारों की रक्षा के लिए नैतिक युद्ध लड़ने की आवश्यकता है ताकि माननीय सर्वोच्च व उच्च न्यायलय के संरक्षण में हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें | यूनियन की मांग नहीं है लेकिन अब पुलिस एसोशिएसन भारतीय संविधान के समानता के अधिकार के अंतर्गत अपने मौलिक अधिकारों का हननं रोकने के लिए कानून की हर चौखट पर दस्तक देंगे और आई पी एस एसोशिएसन और पी पी एस एसोशिएसन अगर अस्तित्व में रहेगी तो विशाल पुलिस कर्मचारियों को भेद भाव के आधार पर इस अधिकार से बंचित रखने के हर षड्यंत्र को बेनकाब भी किया जायेगा और यह अधिकार हासिल भी किया जाएगा | पुलिस के बहादुर साथी शांति पूर्ण ढग से केवल अपने विरुद्ध षड्यंत्रों को परखें , संगठन को ताकत दें और पुलिस परिवारों के कल्याण के लिए दुआ करें |
यह बात एक साक्षात्कार में पुलिस एसोशिएसन के संस्थापक ब्रजेन्द्र सिंह यादव ने इटावा में कही | उनका कहना था कि प्रदेश में एसोशिएसन की जायज आवाज को कुचलने के लिए जो तरीका अपनाया जा रहा है उससे हमारी ताकत बढ़ेगी और षड्यंत्र करने वाले शर्मसार होंगे | हमारी कोशिश अपनी आवाज सत्ता के पास तक पहुँचाने की है मगर लाल फीता शाही के लिए विख्यात तथाकथित महाभ्रष्ट नौकर शाह एक ओर जहाँ सत्ता को अँधेरे में रखने में कामयाब हैं वहीँ वे आई पी एस संवर्ग को कठपुतली बनाकर अधीनस्थ पुलिस कर्मचारियों का अमानवीय उत्पीडन भी करा रहे हैं जिससे पुलिस परिवारों , पुलिस पेंशनरों का गुस्सा सरकार के खिलाफ बढ़ता ही जा रहा है | एसोशिएसन की कोशिश अधिकारीयों का मन बदलने की है हमें न्यायतंत्र पर भरोसा है इसलिए साथियों निराश न हों जीत हमारी होगी |
नीरज महेरे इटावा
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