Saturday, December 11, 2010

लोकतंत्र महाभ्रष्टों की कैद में मायावती बेबस
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नीरज महेरे  
एक वक्त था जब कांग्रेस के युग में दलित अधिकारी जब जिलो में तैनात रहते थे तो पूरी शक्ति से अपने पद की मर्यादा  कायम रखते हुए निष्पक्षता से काम करते हुए प्रदेश नेतृत्व और शासन के अधिकारियों में ही नहीं जनता के बीच भी  खासी लोकप्रियता अर्जित करते थे | सन १९९५ तक का वक्त गवाह है कि तब केवल १०% दलित प्रशासनिक  अधिकारी अपने आचरण  और धन उगाहू शैली से बदनामी कमाते थे | तब ९०% दलित प्रशासनिक अधिकारी अपने कार्य व्यवहार से स्वयं को  श्रेष्ठ  साबित करने में सफल रहते थे जो पिछड़े और सामान्य वर्ग के अधिकारियों में भी प्रशंसा प्राप्त करते थे किन्तु अब पिछले  १५ वर्षो में चौथी  बार  मुख्यमंत्री बनी सुश्री मायावती के कार्यकाल के बीते तीन वर्ष गवाह हैं कि अब दलित अधिकारियों की कार्य  क्षमता   और  लोकप्रियता का पैमाना उलट गया है | शासन की मुखिया दलित हैं और उनका लक्ष्य दलितों में स्वाभिमान पैदा करना और उन्हें अपनी सरकार होने का अहसास कराना   है साथ ही समाज के अन्य वर्गों में अपने शासन की श्रेष्ठता  साबित  करना है मगर परिस्थितियां बता रहीं हैं कि मायावती की अपेक्षाओं पर तमाम अधिकारी खरे नहीं उतर पा रहे हैं | हालत ये है  कि अब केवल १०% दलित अधिकारी ही पुलिस और प्रशासन में अपने शौर्य और ईमानदार प्रशासन का लोहा मनवा पा रहे हैं जिनके आचरण और संवेदनशीलता पर जनता को कोई शक नहीं है जबकि ९०% दलित अधिकारी अनावश्यक अहम् के शिकार  होकर शासन के लिए प्रत्यक्ष रूप से मुसीबत बने हुए हैं | खास बात ये है कि अन्य वर्गों के अधिकारी दलित अधिकारियों के मुकाबले कहीं ज्यादा अच्छा काम कर रहे हैं इसलिए यह कहना कतई अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है कि ९०% दलित अधिकारी जिलो में सिर्फ मायावती के लिए मुसीबतें पैदा करने और अनजाने में ब०स०पा० की जड़ें खोदने का काम कर रहे हैं | चूँकि बसपा के जनप्रतिनिधि और पदाधिकारियों की पहुच मुख्यमंत्री के यहाँ कम से कम है इसलिए ऐसे अधिकारी धन बटोरने शौक पूरा करने और खामखां अपना रौब ग़ालिब करके खुद दलितों के लिए ही नहीं अन्य वर्गों के लिए भी बसपा सरकार के प्रति नफ़रत पैदा करने में जुटे हुए हैं | एसा लगता है कि ऐसे  दलित अधिकारियों के मन में ये साफ़ है कि सरकार चार दिन की   है  इसलिए  उनका ध्यान सिर्फ रुपया कमाने बसपा पदाधिकारियों कार्यकर्ताओं की नाराजगी बटोरने समाज के प्रबुद्ध  वर्गों को औकात बताने तथा इटिंग मीटिंग चीटिंग की राह पर रुपया न देने वालों को दण्डित करने और अच्छा काम करने वालों का मनोबल  तोड़ने पर लगा है जिसका सीधा नुक्सान मायावती को ही होने जा रहा है | एक ओर यह अधिकारी मुलायम सरकार के दौर में कुख्यात रहे अपहरण कर्ताओं ठेकेदारों और हिंसक तथाकथित राजनितिक कार्यकर्ताओं से वसूली करते हुए उनका संरक्षण करके बसपाइयो  की छाती पर मूंग दल रहे हैं वहीँ दूसरी ओर मुलायम विरोधी रहे कार्यकर्ताओं और कर्मचारियों को सिर्फ यादव होने के कारण  भयानक  क्षति पहुंचा कर मुलायम को मजबूत करने में जुटे हैं | जिसका सीधा लाभ कांग्रेस को भी मिलने के आसार बनते  जा रहे हैं | इन अधिकारियों की कार्य शैली सत्ता दल के लोगों को निष्क्रिय करने ओर छकाने वाली है क्योकि ये जानते हैं कि विधायकों  सांसदों और पदाधिकारियों की शिकायतों का कोई प्रभाव उनपर पड़ने वाला नहीं है सो वे  मनमानी के लिए स्वतन्त्र हैं क्योकि प्रदेश मुख्यालय पर बैठे कुछ महा भ्रष्ट नोकरशाह उनकी तैनाती बचाने में लगातार कामयाब हैं और जनप्रतिनिधि अपनी उपेक्षा तथा जनता के दर्दों से मायूस हैं | जिलों के यह अधिकारी अपने आचरण से जनता में यह सन्देश देने में कामयाब हो गए हैं कि वे रुपया देकर आये हैं रुपया कमाकर बने रहेंगे | विधायक और जनता जाये भाड़ में | पूरी तरह साफ़ है कि रुपया बेदर्दी से लूटा जा रहा है थोडा बहुत कहीं पहुचाया भी जा रहा है जबकि रुपया महाभ्रष्ट लखनऊ  में बसूल रहे हैं नाम मायावती का हो रहा है | नौकर  शाह लोकतंत्र के सारे स्तंभों को लीलने में कामयाब होते दिख रहे हैं मायावती इनके  जाल में कैद होकर सच्चाई से दूर हैं और लोकतंत्र का तो क्या अपनी बसपा का भी भला करने में कामयाब नहीं हैं ये अलग बात है कि चार पांच मंत्री अरबपती से खरबपति  बनने की राह पर हों मगर महाभ्रष्टों की लम्बी लाइन लूट में जुटी है | नतीजा तहसील और थाने अधिकतर जनपदों में हर मोड़ और खेत पर खुली लूट की दास्ताँ बयान कर रहे हैं और बसपा सरकार को बुरी तरह बदनाम करने में जुटे हैं जबकि मायावती के दलित प्रेम का नाजायज लाभ ९०% अधिकारी उठाने में जुटे हैं जिनमे आईएएस आई पी एस ही नहीं पी सी एस और पी पी एस भी हैं  और जनता त्रस्त है  जिसका असर पंचायत चुनावों से शुरु होकर २०१२ तक साफ़ दिखेगा | बसपाइयों में घोर निराशा है  यही कांग्रेस के लिए आशा की किरण है | मायावती अब कुछ करने के काबिल शायद नहीं रह गयीं हैं |                                           

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